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बोरिस जॉनसन की जीत से भारत पर क्या असर? जानें क्यों भारतीयों ने दिया उनका साथ

बोरिस जॉनसन के दोबारा सत्ता में लौटने का मतलब है कि 31 जनवरी को ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन से अलग हो जाएगा, जैसा कि उन्होंने वादा किया है। भारत और ब्रिटेन संभावित ब्रेग्जिट के बाद व्यापार सौदों को लेकर पहले ही बातचीत शुरू कर चुके हैं।

ब्रिटेन के आम चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी ने शानदार जीत हासिल की है। पीएम बोरिस जॉनसन को मिले बहुमत से ना सिर्फ ‘ब्रेग्जिट’ पर मुहर लग गई है, बल्कि यह नतीजा भारत के लिए भी काफी अहम है। आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से इसके कई प्रभाव आने वाले समय में दिख सकते हैं। लेबर पार्टी की हार से ब्रिटेन में पाकिस्तान समर्थित कश्मीरी लॉबी को भी जोरदार झटका लगा है।

बोरिस जॉनसन के दोबारा सत्ता में लौटने का मतलब है कि 31 जनवरी को ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन से अलग हो जाएगा, जैसा कि उन्होंने वादा किया है। भारत और ब्रिटेन संभावित ब्रेग्जिट के बाद व्यापार सौदों को लेकर पहले ही बातचीत शुरू कर चुके हैं। इन संभावित व्यापारिक समझौतों का ब्योरा तो ब्रेग्जिट के बाद ही सामने आएगा, लेकिन भारत सरकार चाहेगी कि यह प्रक्रिया जल्द पूरी हो। इसी तरह, भारत यूरोपीय यूनियन से भी व्यापार समझौते को बढ़ाने की उम्मीद करता है। RCEP (रीजनल कॉम्प्रिहेन्सिव इकॉनमिक पार्टनरशिप) में शामिल होने से इनकार के बाद भारत ब्रिटेन और अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों से व्यापार बढ़ाना चाहता है। भारत ब्रिटेन में तीसरा सबसे बड़ा निवेशक है और वहां की इकॉनमी में अहम मौजूदगी रखता है।

चुनाव से पहले भारतीय मूल के मतदाताओं ने लेबर पार्टी के खिलाफ सख्त रुख अपनाया, जबकि परंपरागत रूप से इस पार्टी को उनका समर्थन प्राप्त होता था। कश्मीर पर कॉन्फ्रेंस, नरेंद्र मोदी के लिए सख्त शब्द और कश्मीर को लेकर पाकिस्तानी प्रॉपेगैंडे की ओर झुकाव की वजह से भारतीय मूल के अधिकतर मतदाताओं ने लेबर पार्टी से मुंह मोड़कर कंजर्वेटिव पार्टी के पक्ष में वोट किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 100 ब्रिटिश भारतीय संगठन जैसे, इंडियन नैशनल स्टूडेंट्स असोसिएशन, इंडियन प्रफेशनल्स फोरम ने लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन को खत लिखकर विरोध जताया था।

लंदन में भारतीय दूतावास को निशाना बनाकर पाकिस्तानी-कश्मीरी कार्यकर्ताओं ने दो हिंसक प्रदर्शन किए। इसे लेबर पार्टी के नेताओं का समर्थन प्राप्त था, वे इस्लामिक सेंटिमेंट्स को साथ जोड़कर वोट लेना चाहते थे। ब्रिटेन के हर हिस्से में फैले भारतीय इस बार लेबर पार्टी से दूरी का मन बना चुके थे और इसका चुनावी नतीजे पर असर पड़ा। संक्षेप में कहा जा सकता है कि यह भारतीय समुदाय के लिए नीति बदलने वाला मोड़ रहा।

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